प्यारा बचपन
काली रात में जुगनू का टिमटिमाना,
और हमारा उन्हें पकड़ने की चाह में दौड़ें चले जाना,
न रास्ते की परवाह न ख़रोंच का डर,
बचपन भी क्या खूब था निडर,
पेड़ पर बिन सोचे चढ़ जाया करते थे,
आम,अमरुद, जामुन,शहतूत से झोलियां भर लाया करते थे।
फिर उन कच्ची अमियों को भूसे में छुपाकर रखते थे।
कोई देख न ले हमारे इस ख़ज़ाने को,
इस बात की पूरी निगरानी भी रखते थे।
सुबह उठकर मठ्ठे के साथ रोटी का अपना ही स्वाद था,
और नानी के अचार का तो गज़ब ही विचार था,
याद हैं मुझे कई बार चोरी किया था मैंने,
नानी के उस बक्से से आचार वो भी पलटन के साथ,
सबके साथ मिलकर वो छत की धुलाई,
और सबके सोने के लिए गद्दों की जो कतार लगाई,
तकियों का कम पड़ जाना लाज़मी ही रहता था,
और भैया हमेशा तकिया चुराने की ताक में रहता था।
डर रहता था कि तकिया चोरी न हो जायें,
पर करते भी क्या निगरानी भी आखिर कब तक की जाएं
ये तो तभी तक होती थी जब तक नींद न आ जायें।
पुष्पा शर्मा

