दिनांक 24 दिसम्बर 1924 कोटला सुल्तान सिंह in undivided India में जन्मे रफ़ी साहेब सन 1944 में बोम्बे आये और देश के सुर ताज बन गए !
उनकी वोह मखमली आवाज़ वोह परफेक्ट सुर --- मोहम्मद रफ़ी को भला कौन भूल सकता हैं --- ऐसा गायक आज तक पूरे भारत में दूसरा कोई नहीं हुआ -----
रफ़ी साहेब की पहली स्पेटेज फोर्मेंस 1937 में k.l sahgal के लिये organize किये गए एक कार्यक्रम में हुयी थी !
"सौ बार जन्म लेंगे सौ बार फ़ना होंगे ऐ जाने वफ़ा फिर भी हम तुम न जुदा होंगे -"-
ओ दुनिया के रखवाले सुन दर्द भरे मेरे नाले सुन दर्द भरे मेरे नाले तो एक दम अलग अंदाज़ का गीत
ऐसा अद्भुत गायक जो किसी भी मूड में गाते वक़्त शब्दों में वातावरण का पूरा वर्णन दे देता था
मैं चली मैं चली यह न पूछो कहाँ duvet में रफ़ी साहेब का गायकी ---सजदे में हुस्न के झुक गया आसमां गाने का अलग ही अंदाज़ है------
तो "निगाहों निगाहों में जादू चलाना मेरी जान सीखा हैं तुमने जहाँ से" --- पंक्ति सुनते ही एक युवा छवि उभर के आती हैं जो थोडा शोख भी हैं और थोडा गंभीर भी -----
28 हज़ार गाना गाने वाले रफ़ी साहेब ने 11 अलग अलग भारतीय भाषाओं में गीत गाये जिनमे बँगला ,उड़िया, सिन्धी, कोंकणी, असमिया, भोजपुरी, मराठी ,गुजराती, तमिल ,तेलगु , मगही ,मैथली में भी गाने गाये हैं!
अद्भुत प्रतिभा के धनी मुहम्मद रफ़ी साहेब ने ने विदेशी भाषा अंग्रेजी , अरबी ,फारसी, सिंहाला , मरिशियन , डच भाषा में भी गीत गाये हैं !
मोहम्मद रफ़ी ने हिंदी/ उर्दू भाषा में सबसे अधिक गीत गाये हैं, उसके बाद पंजाबी भाषा में गाने गाये हैं --- पंजाबी में शबद भी गाये हैं जिनमे "मीतर पियारे नू----बहुत प्रसिद्ध शबद हैं !"
रफ़ी साहेब का पहला प्लेबैक गीत पंजाबी फिल्म से ही हैं ---गाना हैं ---सोनिये नी हिरिये नी -संगीत कार श्यामसुंदर फिल्म का नाम था गुल बलोच -------वर्ष 1944 में पहला प्ले बेक करने के बाद रफ़ी साहेब को आल इंडिया रेडियो लाहोर ने अपने यहाँ गाना गान एके लिए निमंत्रण भेजा ---
सन 1944 में रफ़ी साहेब बम्बई अपनी आ गाये और फिर उनकी गायन कला की एक अद्भुत यात्रा प्रारम्भ हुयी इस यात्रा में उन्होंने 6 बार फिल्म फेयर अवार्ड से नवाज़ा गया ---उन्हें नेशनल फिल्म अवार्ड भी मिला ---1967 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया---मरणोपरांत वर्ष 2016 में एक डाक टिकेट भी उनके नाम जारी किया गया
31 जुलाई 1980 में अचानक ही यह सितारा डूब गया ----दिन के 10 बजे के लगभग दिल का दौरा पड़ा और रफ़ी साहेब हमेशा के लिए हम सब से दूर चले गए !
"बहुत याद आते हैं वोह सितारे जिन्हें चमक में खो जाते हैं हम सारे"
कला के धनी अद्भुत गायक -रफ़ी साहेब के जीवन का आखिरी गीत -- जो उन्होंने फिल्म आस पास के लिए गाया था --- ऐसा लगता हैं मानो अपने फैन के लिए ही गाया हो ---यह गीत --
"तेरे आने की आस है ! दोस्त ! शाम फिर क्यों उदास है ! दोस्त !
महकी महकी फिज़ा कहती हैं तू कहीं आस पास है !दोस्त!
तू कहीं आस पास है दोस्त "



