जैसे सीलन से हटती दीवार की सफ़ेदी।
सीलन की वो महक मुझे नहीं पता मैं उसे खुशबू कहूँ या बदबू,
लेकिन जो भी है अच्छी लगती है मुझे लेकिन
धीरे धीरे पूरी दीवार में फैल कर अच्छे खासे घर की दीवारों को खराब कर देती है
बिल्कुल वैसे ही जैसे एक ग़लत कदम किसी खूबसूरत रिश्ते को।
और फिर वो रिश्ता भी दीवार से छूटी हुई सफ़ेदी की तरह हो जाता है
जुड़ा तो होता है लेकिन अपनी पकड़ खो देता है
लेकिन हम सोचते हैं पकड़ खो दी तो क्या हुआ जुड़ा तो है दीवार से
दीवार सुंदर तो लग रही है ना,
जब उखड़ना होगा खुद-बा-ख़ुद उखड़ जाएगा
बेकार में दीवार क्यों खराब करनी
कुछ रिश्तों को भी ऐसे ही तो जोड़े रखते हैं हम,
ज़िन्दगी सुंदर लगती है उनके जुड़े रहने से
पर असल में वो रिश्ता कबका टूट चुका होता है
हमें पता होता है कि वो रिश्ता वही उखड़ी सफ़ेदी है
लेकिन फिर भी दीवार सजाना चाहते हैं उससे
हम ये नहीं समझ पाते
कि उस हटती सफ़ेदी को उखाड़ देना कितना जरूरी है,
उस रिश्ते को ज़िन्दगी से निकाल देना जरूरी है,
वरना वो हटती सफ़ेदी की तरह मर-मर कर ख़त्म होगा एकदिन
वो दीवार ज़िंदगी है और दीवार सजाने के लिए दीवार को ही खतरे में डालना सही नहीं है
क्योंकि सफ़ेदी तो फ़िर से हो सकती है उस दीवार पर,
लेकिन दीवार फिर से खड़ी करना कोई मामूली काम नहीं है।


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